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पावन चिंतन धारा आश्रम भारत की महान ऋषिकुल परंपरा का आश्रम है जो,                       ध्यान-साधना-तप पर आधारित है                       “राष्ट्र धर्म सर्वोपरि” के सिद्धांत में विश्वास रखता है                       धर्म, दर्शन व इतिहास का वैज्ञानिक शिक्षण देता है                       सेवा को आध्यात्मिक जीवन का प्रारंभ मानता है                       व्यक्तित्व की शुद्धता और गुणों के विकास हेतु प्रशिक्षण देता है                       कर्महीनता, अज्ञानता, अंधविश्वास व पाखंड से दूर रहने का आग्रह करता है                       अधिष्ठात्री– माँ दुर्गा                       प्रेरणा –स्वामी विवेकानंद                       प्रथम पूज्य- भारत माता                       छत्रछाया- धर्म ध्वज                       जीवन सूत्र- प्रभु नाम- प्रभु काम- प्रभु ध्यान                      

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पावन चिंतन धारा आश्रम में शिवलिंग स्थापना

20-जुलाई-2016 को सावन मास का शुभारम्भ हुआ और आश्रम परिसर में नवनिर्मित शिवालय में शिवलिंग की स्थापना हुई|

बहुत उत्साह और भक्ति के साथ आश्रम परिवार सदस्यों एवं प्रशिक्षु वर्ग के विद्यार्थियों ने पूरे आश्रम को साफ़-सुथरा व सुस्सजित किया |

संध्या पूजन के उपरांत शाम का भंडारा आरम्भ हुआ | भंडारे के पश्चात श्रीगुरु जी ने प्रवचन क्षेत्र में शिवलिंग की महत्ता एवं आश्रम में उसकी स्थापना के विषय में चर्चा की | फिर शिव की महिमा पर आधारित भजनों का सभी ने आनंद लिया | ठीक 10:15 बजे 21 प्रशिक्षु धोती पटका पहने कांवड़ लिए पंक्तिबद्ध होकर उपस्थित हुए| श्रीगुरु जी सभी को चन्दन का त्रिपुंड लगाया और गंगा जल लाने के लिए विदा किया | इसके साथ ही अलग-अलग शहरों से पधारें परिवार सदस्यों को भी श्रीगुरु जी ने त्रिपुंड लगाकर मुरादनगर गंगनहर से, जलाभिषेक के लिए, गंगाजल लाने के लिए रवाना किया | सभी सदस्य पैदल (कुछ नंगे पाँव) गंग नहर तक पहुंचे | नदी किनारे जलपान करके वापसी के लिए आश्रम कांवड़ियों का जत्था फिर से चल दिया | ठीक २:30 बजे सभी जल लेकर आश्रम पहुंचे| सभी कांवड़ियों का स्वागत आश्रम द्वार पर खड़े होकर श्रीगुरु जी स्वयं किया | प्रशिक्षुओं को स्नान कराया गया, त्रिपुंड लगाया गया, रुद्राक्ष की माला पहनाई गयी और मिश्री का भोग लगाया गया | फिर घंटा-घड़ियाल, नगाड़े व जयकारे के साथ शिवालय का परदा हटाया गया और सभी ने बाबा के दर्शन किये | सर्वप्रथम प्रशिक्षुओं ने बाबा का जलाभिषेक किया | फिर श्रीगुरु जी ने शमशान की भस्म से अभिषेक किया, फिर शहद, गन्ने का रस, पंचामृत, घी से शिवलिंग का अभिषेक किया | बारी-बारी से सभी लोगों ने गंगा जल से, फिर दुग्धाभिषेक किया | यहाँ यह बताना आवश्यक है कि श्रीगुरु जी द्वारा पूर्व में भी कई बार बताया जा चुका है कि दूध सिर्फ एक-दो चम्मच ही शिवलिंग पर चढ़ाना चाहिए, शेष निर्धन बच्चों में बाँट देना चाहिए | इसी बात को ध्यान में रखते हुए गंगा जल में थोडा सा ही दूध मिलाया गया | दुग्धाभिषेक के उपरांत फिर से परदा लगाया गया और भोले-बाबा का श्रृंगार रुद्राक्ष, सफ़ेद-पीले व लाल फूलों एवं चांदी के मुकुट से किया गया| श्रृंगार उपरांत सभी ने भोले बाबा के दिव्य दर्शन किये |

फिर समय हुआ आरती का |

श्रीगुरु जी ने खप्पर में उपले से, फिर 51 कपूर के दीयों से, फिर पंचमुखी कपूर दीपक से, सरसों के तेल से, फिर घी के दीपक से शिवलिंग की आरती की | सभी को आरती दिखाई गयी | श्रीगुरु जी ने ऊपर मंदिर में जाकर माँ की, सभी देवी-देवताओं की, स्वामी जी, गौतम बुद्ध जी, गुरु नानक जी, महावीर स्वामी जी की आरती की व भोले बाबा को दण्डवत् प्रणाम कर अपने कक्ष में चले गए |

शेष सभी लोगों ने बाबा को प्रणाम किया व यज्ञ उपरांत प्रसाद ग्रहण कर कुछ ने अपने घर को प्रस्थान किया व कुछ रुद्राभिषेक के लिए ठहर गए |

इस अत्यंत दिव्य व भव्य तरीके से हिसाली आश्रम से भोले बाबा का आगमन हुआ |

इस अवसर पर गाज़ियाबाद सांसद प्रतिनिधि श्री नरेंद्र शिशौदिया जी व भाजपा के वरिष्ठ नेता व समाजसेवी श्री अजय गुप्ता जी व अन्य सामाजिक संगठनों से लोग उपस्थित थे |

 

 

 

 

स्वामी जी का निर्वाण दिवस

4-जुलाई को सायं 5:३० बजे आश्रम के ध्यान मंदिर में स्वामी विवेकानंद जी का तिलक वंदन एवं पुष्पार्चन कर श्रीगुरु जी ने अपने गुरु जी को भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी|

श्रद्धांजलि के उपरांत आमतौर पर स्वामी जी के निर्वाण दिवस पर अनमने से, उद्दास से रहने वाले श्रीगुरु जी आज अलग ही तेवर में दिखे | आज वो उखड़े हुए थे | स्वामी जी के जीवित रहते हम भारतीयों ने उनकी जो अवहेलना की, उसका दर्द श्रीगुरु जी में आज मुखर हो उठा था उन्होंने अपना उद्भोदन आरम्भ ही कुछ इस तरह से किया कि लोग स्वामी जी के नाम को मिसयूज़ करते हैं, स्वयं की इमेज बिल्डिंग के लिए या प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए | उन्होंने दुःख प्रकट करते हुए कहा “मैं ऐसी दुकानों या दुकानदारों को बंद नहीं करा पाया” |

स्वामी जी के संघर्ष की गाथा सुनाते हुए वे कई बार भावुक हुए और बोले “प्यार क्या होता है, यह मुझे गुरु जी प्यार होने के बाद पता चला” | उन्होंने अपने बचपन की वह घटना भी बताई जब उन्हें खुली आँखों से एक सन्यासी उनके घर में दिखता था और कक्षा चार में जब वे एक स्कूल में किसी वाद-विवाद प्रतियोगिता में गए तो उन्होंने पहचाना की वह सन्यासी स्वामी विवेकानंद जी थे | उस प्रतियोगिता में मिली पुरस्कार स्वरुप स्वामी जी की एक पुस्तक से उन्होंने विवेकानंद जी को जाना और धीरे-धीरे वह स्वप्न उन्हें अक्सर आने लगा जिसमे स्वामी जी उन्हें बुला रहे हैं | बस तभी से दिशा भी, उद्देश्य भी, राह भी और मंजिल भी स्पष्ट हो गए |

श्रीगुरु जी ने राजयोग क्या है, बताते हुए एक रहस्य भी उद्घाटित किया कि स्वामी जी द्वारा प्रदत्त राजयोग वही है जो श्रीगुरु जी अपने परिवार सदस्यों को सिखाते हैं, शिविरों में जिसका अभ्यास कराते हैं – बस यह नहीं बताते थे कि यही राजयोग है क्योकि वे डरते थे कि लोग यह साधना सिर्फ यह सोचकर न करें कि इससे उन्हें कुंडली राजयोग प्राप्त हो जायेगा | स्वामी जी राजयोग तो आत्मसाक्षात्कार का, ब्रह्म प्राप्ति का साधन है |

अपने गुरु जी को समर्पित भजन “हे मेरे गुरुदेव....” का गान हमारे श्रीगुरु जी करते रहे और उनकी स्वरलहरियों से निकल कर जो पीड़ा पूरे ध्यान मंदिर में फ़ैल रही थी, सभी उपस्थित जन ध्यान मग्न हो उसे महसूस कर रहे थे | तदुपरांत श्रीगुरु जी अपने कक्ष में चले गए और बाकि लोग मंदिर में, संध्या आरती के लिए |

इसी के साथ निर्वाण दिवस का कार्यक्रम पूर्ण हुआ पर श्रीगुरु जी के उद्भोदन में कुछ वाक्य ऐसे भी थे जो सोचने पर मजबूर करते हैं –

“हम समय रहते न तब पहचान पाए अपने स्वामी को न ही आज पहचानते है|”

“किसी के नाम का, किसी के ज्ञान का प्रयोग, धन व प्रतिष्ठा कमाने के लिए, करने वाले बेशर्मों की जमात बहुत बड़ी है|”

और अंतिम बात....

“शिष्य जब गुरु को रोम रोम में बसा लेता है तो गुरु का सारा ज्ञान, साधना, बल, तप सब शिष्य को स्वतः ही मिल जाता है, बस शिष्य ईमानदार हो|”

ऐसी ही कई और बातें हैं जो श्रीगुरु जी कल कहीं और पहले भी कहते रहे हैं, वो शब्द आश्रम परिसर में बिखरे पड़े हैं, क्या हम कभी इन्हें अपने हाथों से समेट पायेंगे?

 

 

 

DVDD (Defeat Vitamin -D Deficiency) राष्ट्रव्यापी अभियान"

दिनांक 19-जून-2016 को DVDD (Defeat Vitamin -D Deficiency) राष्ट्रव्यापी अभियान के अंतर्गत कुसलिया गाँव, निकट मुरादनगर, गाज़ियाबाद में पावन चिंतन धारा आश्रम द्वारा निःशुल्क स्वास्थ्य परीक्षण शिविर का आयोजन किया गया|

कार्यक्रम का आरम्भ हुआ भारत माँ के जयघोष से.....फिर आश्रम के सेवा प्रकल्प के समन्वयक श्री अजीत शुक्ला जी ने वहां उपस्थित लोगों को आश्रम के उद्देश्य और सेवा प्रकल्प के विषय में बताया| तत्पश्चात आश्रम के कार्यकर्त्ता श्री तरुण शर्मा जी ने सभी को आश्रम के DVDD अभियान के बारे में बताया| उसके पश्चात वरदान हॉस्पिटल से पधारे डॉ. अनूप जी व डॉ. मदन जी ने गाँववासियो को विटामिन- डी की कमी से होने वाली विभिन्न समस्याओं के बारे में बताते हुए बच्चों के विटामिन-डी का परिक्षण शुरू किया । एक ओर जहाँ बच्चों का परिक्षण किया जा रहा था तो दूसरी ओर आश्रम परिवार के कुछ सदस्यों ने कहानी, देशभक्ति गीत, भजन, कविताओं के माध्यम से बच्चों में राष्ट्रप्रेम की भावना को उजागर किया | इस शिविर में 138 बच्चों के विटामिन-डी का परीक्षण किया गया तथा सभी बच्चों को नोटबुक वितरित की गयी| इस पावन कार्य के लिए आश्रम वरदान हॉस्पिटल के डॉक्टर्स, उनकी टीम एवं कुसलिया गाँव के प्रधान श्री सुजन सिंह जी का ह्रदय से साधुवाद करता है|

 

 

 

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर "ॐ रहस्य, नादाभ्यास एवं संकीर्तन"

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस अर्थात 21-जून-2016 को ‘ॐ रहस्य, नादाभ्यास एवं संकीर्तन’ कार्यक्रम गाजियाबाद शहर में आयोजित हुआ जिसमें विख्यात आध्यात्मिक गुरु श्री गुरु पवन जी ने अनेक रहस्यों का उदघाटन किया |

कार्यक्रम का आरम्भ ठीक 6 बजे शंखनाद से हुआ | भारत माँ और स्वामी जी के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन के उपरांत आश्रम की सुर साधक मण्डली ने अद्भुत भजनों से भगवान शंकर का गुणगान किया और तत्पश्चात श्रीगुरु जी ने अपना दिव उदबोधन आरम्भ किया |

उन्होंने बताया कि ‘ॐ’ का विरोध मुख्यतः इस कारण हुआ है क्योंकि ‘ॐ’ के अर्थ एवं रहस्य को बहुत कम लोग जानते है| ‘ॐ’ योग का आधार है| ये किसी धर्म के मनुष्य द्वारा गढ़ा गया शब्द नहीं है. बाइबिल में भी संत जॉन ने इसका वर्णन किया है| श्रीगुरु जी ने कहा कि आज से 2400 वर्ष पूर्व राजयोग पूरी दुनिया में छाया हुआ था| पाईथागोरस, प्लूटो, नव बाल्तानवाद के सदस्य, मिस्र, तथा रोमन कैथोइलिक ईसाईयों ने इसका अभ्यास भी किया था| बिना राजयोग के ब्रह्म को पाना असंभव है और बिना ‘ॐ’ के अभ्यास के राजयोग सिद्ध नहीं हो सकता| ऋषि पातंजलि ने भी अष्टांग योग के माध्यम से इसी राजयोग को अपनाने की प्रेरणा दी है| उन्होंने कहा कि भारत की परंपरा शोध और विज्ञान परक रही है| उन्होंने नासा का 2011 का वो विडियो दिखाया जिसमें सूर्य एक विशेष ध्वनि उत्पन्न कर रहा है जो ‘ॐ’ की ध्वनि है और कहा की मैत्रीय उपनिषद में स्पष्ट लिखा है - “ॐ ब्रह्माण्ड का पवित्र नाद है| यह आत्मा का नाद स्वरुप है|” इसका अर्थ है 3000 वर्षों से भी पहले हमें ब्रह्माण्ड के इस रहस्य का पता था इसीलिए ऋषियों ने ‘ॐ’ को ब्रह्म कहा| उन्होंने जानकारी दी की मंडूक उपनिषद भी कहता है – ॐ ही अखिल विश्व है| यही ब्रह्म है| यही भूत, वर्तमान व् भविष्य है...

उन्होंने कहा कि ॐ में तीन अक्षर है अ,उ और म| ‘अ’ के उच्चारण से पेट, ‘उ’ से ह्रदय व कंठ तथा ‘म’ से मष्तिष्क सुदृढ़, व बली होता है| उन्होंने कहा कि ‘ॐ’ से रक्त-प्राण-कोशिकाएं सन्तुलित होती है जिससे रोग भी ठीक होते है और आयु बढ़ती है, दुर्भाग्य से जूझते लोग ‘ॐ’ के सही उच्चारण से ग्रह भी ठीक कर सकते हैं| ‘ॐ’ के सही उच्चारण से घर शुद्ध होता है और विचार सकारात्मक रहते है| क्योंकि ‘ॐ’ त्रिदेव का प्रतीक है| "अ"ब्रह्मा का, "उ" विष्णु का तथा "म" रुद्र का वाचक है|

उन्होंने कहा कि अधिकतर लोगों को ‘ॐ’ का सही उच्चारण नहीं अता| जब तक नाद की उत्पत्ति ना हो तब तक ‘ॐ’ का कोई अर्थ नहीं है| इसी नाद और ध्यान से वातावरण में व्याप्त अनेक ध्वनियाँ भी सुनी जा सकतीं हैं| नाद का अर्थ बताते हुए उन्होंने यह भी बताया कि ध्यान की किस अवस्था में ब्रह्माण्ड की कौन सी ध्वनियाँ सुनाई देती हैं |

उन्होंने कहा कि मनुष्य को पहले ज्ञान मार्ग का अनुसरण करना चाहिए जिससे शंकाए मिटे और उसके उपरान्त की गयी भक्ती ही सिद्ध होती है| उन्होंने कहा कि भक्ति योग सबसे कठिन है क्योंकि भक्त अपने भगवान को पूर्ण समर्पित होते हुए उस जैसा ही शांत, क्षमावान, दयालु और वीर रक्षक होता जाता है| परन्तु भक्ति करने का दावा, दिखावा या बात करने वाले अधिक्तर लोग मन से परिवेर्तित नहीं होते| पूजा करने के उपरान्त भी ना तो कर्म से कुशल होते है और ना ही व्यवहार से| ऐसा इसलिए होता है कि वो मन को साध ही नहीं पाते और यहाँ योग मन को साधने में मदद करता है जिससे मानव की सांसारिक और आध्यात्मिक उन्नत्ति होती है|

उन्होंने कहा कि ‘मैं इस बात से दुखी हूँ की समस्त विश्व को योग के अधूरे अर्थ समझाए जा रहें है|’ आज योग सिर्फ व्यायाम तक ही सिमट कर रह गया है, केवल शारीरिक स्वाथ्य की दवा बना कर प्रस्तुत किया जा रहा है या ख़ास समाज में ‘योगा’ होकर फैशन के रूप में दिखाया जा रहा है जबकि योग तन-मन-इन्द्रियों को एकाग्रचित्त करते हुए ब्रह्म की प्राप्ति का माध्यम है| उन्होंने कहा कि इसीलिए रोग बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की क्योंकि ये योग मन पे काम नहीं करता| योग के दो स्वरुप हैं- बहिरंग एवं अन्तरंग| बहिरंग योग में यम, नियम, आसन आते हैं जो शरीर साधते हैं, फिर प्राणायाम तथा प्रत्याहार का अभ्यास होता है जिससे इन्द्रियां नियंत्रित होती हैं उपरान्त धारणा, ध्यान तथा समाधि का अभ्यास होता है जिससे परमब्रह्म या इश्वर की कृपा की प्राप्ति होती है| उन्होंने कहा कि विश्व जिस योग को समझना चाहता है वो यही पूर्ण योग है जिससे तन-मन-चरित्र; यह लोक और परलोक सभी सुधरते है| इसीलिए ऋषि पातंजलि ने अष्टांग योग की खोज की जिससे चित्त की वृत्ति का निरोध हो सके और मानव अपने भीतर की पशुता का नाश कर श्रेष्ठ बन सके|

श्रीगुरु जी ने कहा कि इस प्रकार का योगाभ्यास किसी साधारण से विद्यार्थी में भी असाधारण गुण उत्पन्न कर देता है क्योंकि वो क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त, एकाग्र तथा निरुद्ध स्थितियों से निकलकर विलक्षणता प्राप्त करता है| अतः विद्यार्थियों को पूर्ण योग क्रियायों का अभ्यास करना आवश्यक है|

उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि कोई व्यक्ति ज्ञान, भक्ति या ब्रह्म कैसे प्राप्त कर सकता है| इसके तीन मार्ग हैं, समर्पण-श्वास संतुलन-साधना| यदि ये गुण किसी भी व्यक्ति में हों तो वो अपना भाग्य तक बदल सकता है| उन्होंने कहा- जीवन में सफलता पाने के लिए सदा प्रभु नाम-प्रभु काम-प्रभु ध्यान का सूत्र याद रखना चाहिए|

उन्होंने उपस्थित लोगों को पतंजलि सूत्र दिया ‘ यत्नोभ्यासः’ यत्न विशेष को अभ्यास कहते हैं यानी अभ्यास किये बिना ज्ञान नहीं होगा अतः सफलता की कामना करने वाले लोगों को अभ्यास से जी नहीं चुराना चाहिए|

इस अवसर पर उन्होंने नाद स्वर का अभ्यास कराया|

इस कार्यक्रम में तक़रीबन 850 लोग मौजूद थे जो प्रेक्षाग्रह के अन्दर भी थे और बाहर स्क्रीन पर गुरूजी की वाणी का लाभ उठा रहे थे |

 

 

आश्रम में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस...

योग दिवस के अवसर पर आज सुबह 6 बजे से ही आश्रम परिसर में पास के गाँव के बच्चे और बड़े आना शुरू हो गए| जैसे ही यज्ञ पूर्ण हुआ ‘योग एवं प्राणायाम सत्र’का कार्यक्रम रोहित केसरी जी के भारत माँ के उदघोष के साथ आरम्भ हुआ| आश्रम के उद्देश्य की चर्चा करते हुए बहिर्रंग एवं अंतर्रंग योग की विवेचना करते हुए उन्होंने योगाभ्यास के लिए श्री प्रमोद केसरवानी जी को आमंत्रित किया| तक़रीबन 50 मिनट चले योगाभ्यास में ताड़ासन पवनमुक्त आसन, मंडूक आसन, से लेकर सूर्य नमस्कार तक का विधिवत् अभ्यास हुआ| इसके बाद श्री तरुण शर्मा जी ने सभी को प्राणायाम व ध्यान का अभ्यास कराया| श्रीगुरु जी ने भी अपने संक्षिप्त उद्भोदन में योग की महत्ता बताते हुए, सभी को बताया कि शिव ही योग के जनक हैं और सभी गाँव वालो को यह सूचना दी कि जुलाई माह से हर माह के अंतिम रविवार को प्रातः काल, गाँव के बच्चों के लिए ‘योग व प्राणायाम सत्र’ लगाया जायेगा|

बच्चों एवं बड़ों ने बड़े हर्ष के साथ हर माह आने को कहा और शेष 29 दिन घर में स्वयं अभ्यास करने का आश्वासन भी दिया| इस कार्यक्रम में कन्नोजा गाँव के प्रधान, हिसाली गाँव और कुसलिया गाँव के कुछ गणमान्य लोग और दूसरे शहरों से आये हुए परिवार सदस्य भी उपस्थित थे| तो इस तरह योगमय हुआ आश्रम परिसर|